फास्ट ट्रैक अदालत पर संक्षिप्त विवरण
फास्ट ट्रैक अदालत अतिरिक्त सत्र न्यायालय होता है, इन अदालतों का गठन लम्बी अवधि से लंबित अपराध तथा अंडर ट्रायल वादों को तीव्रता से निपटारे हेतु किया गया है, इसके पीछे प्रमुख कारण यह है कि वाद लम्बा चलने से न्याय की क्षति कारक होती है, तथा न्याय की निरोधक शक्ति कमजोर पड जाती है, और जेलों में भीड बढ जाती है | फास्ट ट्रैक अदालतों की कार्य प्रणाली ट्रायल कोर्ट या सेशन कोर्ट की ही तरह होती है, लेकिन इनकी मूलभूत व्यवस्थाएं थोड़ी बेहतर होती हैं |
वर्ष 2000 में जब इन अदालतों के गठन की प्रक्रिया शुरू हुई थी, 10 वे वित्त आयोग की सलाह पर केद्र सरकार ने राज्य सरकारों को 01-04-2001 से 1734 फास्ट ट्रेक कोर्ट गठित करने का आदेश दिया था, अतिरिक्त सेशन जज याँ उंचे पद से सेवानिवृत जज इस प्रकार के कोर्टो में जज होते है, व इस प्रकार के कोर्टो में वाद लंबित रहना संभव नहीं होता है, हर वाद को निर्धारित समय में निपटाना होता है |
हालांकि पिछले कुछ वर्षो में इन अदालतों का प्रमुख ध्यान महिलाओं और बच्चों के ख़िलाफ़ होने वाली आपराधिक व हिंसात्मक के मामलों पर केंद्रित रहा है, ऐसे ही एक मामले में अलवर में एक जर्मन युवती के साथ बलात्कार के मामले में फास्ट ट्रैक अदालत ने करीब एक महीने से भी कम समय में सुनवाई पूरी की और दोषी को सज़ा के बाद जेल भी हो गई, (घटना साल 2006 में 21 मार्च) |
व अन्य कई मामलो में भी फास्ट ट्रैक अदालत ने अपने महत्व को साबित किया है |
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